DIGVIJAY SINGH (JNU) ''भारत एक कहानी''

''भारत एक कहानी'' पर सद्यः उद्भूत कुछ पंक्तियाँ वाक् वैखरी में परिवर्तित हो गई हैं, जो नीचे अंकित करना चाहूँगा-
भारत एक कहानी,
आज हमारी जुबानी।
सुनना जरूर इन लफ्जों को,
ये बात बहुत ही पुरानी।।
पहले ऋषियों का जीवन था,
वेदों का अनुपम गायन था।
योगी तब ध्यान लगाते थे,
ज्ञान पुष्प छितराते थे।।
तब शान्त सुगन्धित भूतल था,
पर आज शहर में कम्पन है।
इस कम्पन का कारणयह है कि 
जगह-जगह पर रावण हैं।।
तब मानवता का उन्नत माथा था,
आज शर्म से झुका हुआ।
क्या कारण है इस अवनति का
आज बताने मैं निकला।।
जो देश ज्ञन का उद्गम हो,
अपने बच्चों से पीडित है।
बेर्शम हुई मानवता ही क्या
उसके पीछे कारण है।।
बच्चों को उनका बचपन दो,
वृद्धों से माँगो आशीर्वाद।
क्या यही चहाते हो कि
भारत एक कहानी रह जाए।।
गर नहीं चाहते ऐसा कुछ तो,
कुछ ऐसा तुम कर जाओ।
आने वाली पीढी बच्चों से
कहे कि तुम उस सा बन जाओ।
फिर सोचों कैसा देश बनेगा,
रहेगा केवल एक कहानी।
सोने की चिड़िया फिर देखोगे,
यही भारत की अमिट निशानी।।
लवकुश ध्रुव प्रहलाद बनो तुम
मानवता का त्रास हरो तुम।
सीता, सावित्री, दुर्गा बन
कर सशक्त भारत माँ प्रणयन।।
राम, कृष्ण, बुद्ध, नानक, गाँधी सम,
खुद को इतना उन्नत कर लो
फिर देखोगे भारतमाता
को क्या दुनियाँ बोलेगी।।
बात मानलो आज हमारी,
कल दुनियाँ मुठ्ठी में तुम्हारी।
तब नहीं कहेंगे दूसरे
भारत को सपेरों का देश।
जब सिद्ध कर लियाहोगा तुमने
डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक का भेष।।
इतना सब पाकरके भी खुद 
इतना नीचे मत गिर जाना।
जिससे, दुनियाँ कहने लग जाए,
ये हैं बिगड़े भारत का ताना—बाना।।
सत्य अंहिंसा मानवता और प्रेम
है यही भारत की कहानी।
लो आज सुनो दुनियाँ वालों,

मैं सुना रहा भारत एक कहानी।।

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