''कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों से दुश्मन रहा है दौर-ए-जहाँ हमारा। इकबाल के ये शब्द शायद भारत की परिभाषा गढ़ने में एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान देते है। राजनीतिक शास्त्र में राज्य, राष्ट्र और राष्ट्र—राज्य के वर्गों में लगभग सभी देशों को श्रेणित करता है। पर भारत इन सभी श्रेणी को तोड़ते हुए अपने आप में एक नई श्रेणी का निर्माण करता है। जिसको कई विद्वान 'Civilizational state' या ‘सांस्कृतिक सभ्यता राज्य में कह सकते है। यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि चार हजार से भी ज़्याद पुरानी सभ्यता ने दुनिया को जो भी दिया, उससे प्रगति और विकास ही के नए आयाम खुले। विशेष बात तो यह है कि ऐसे समय में जब बाज़ारीकरण और भूमण्डलीकरण सभी संस्कृतियों और सभ्यताओ को टक्कर देकर पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है तब भी भारत की कहानी खतम नहीं हो रही है और खत्म होगी भी नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस संस्कृति ने हमेशा मध्यमा और संतुलन का मार्ग अपनाया है कई राजा आए, राज किया, साम्राज्य बनाया हारे, नए राजा आयें और यह सिलसिला क्रम चलता रहा। प्राचीन सभ्यताओं में हमेशा Divine Right Theory का प्रचलन रहा, अर्थात् राजा किसी भी विधि कानून बंधन के ऊपर है। जबकि भारत में हमेशा समाज और राज्य व्यवस्था का संतुलन रहा है। राजा को भी यहा विद्वान, ज्ञानी ओर संतो के आगे नतमस्क होना पड़ता है। इसीलिए राजा आते जाते रहे, समाज कहीं नहीं गया, संस्कृति आती रही, सभ्यता वही रही। इसका उदाहरण तो हम आज तक देखते रहते है। आज जहां सारा संसार मंगल में जीवन ढूंढ रहा है। भारत ही ऐसा देश है जो जीवन में मंगल ढूंढता है। भारत सिर्फ एक राष्ट्र नहीं है, यह एक भाव है जो हर भारतीय में बसता है, फिर चाहे वो कहीं भी हो। अमेरिका में भी जब दीवाली मनाई जाती है तो वो भारत भाव का प्रकाश होता है। प्रवासी भारतीय दिवस में जब ट्रिनिडाड की भारतीय मूल की प्रधानमंत्री कमला विसेसर जब भारत की राष्ट्रपति श्रीमति पाटिल के चरण-स्पर्ष करती है, तो वो भारत होता है मारिशियस में भी जब होली मनाती है, भोजपुरी बोली जाती है वो भारत होता है। यह भाव कोई धार्मिक भाव नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक भाव है जिससे हर भारतीय ओत प्रोत है। दारा शिकोह जब उपनिषदों को फारसी में लिखते है, वो भारत होता है। कृष्ण जन्माष्टमी में जब बुरका डाली महिला अपने छोटे से पुत्र को कृष्ण सा सजा के गोद में लेके जाती है, वह भारत होता है। यह साझा विरासत है। इसमें कोई, मेरा या तुम्हारा नहीं होता, सब हमारे होते हैं। यही राज्य धर्म भी है और राष्ट्र धर्म भी है जिसको कौटिल्य, मनु आदि ने अनेक पुस्तकों में लिखा है। यह वही सभ्यता है कि इसने जिसको बुद्ध दिया उसी ने इसको युद्ध दिया।
हर राष्ट्र अपने आप को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखता और अपने भविष्य का लेखा जोखा करता है। लेकिन भारत जब भी इतिहास बदलने बैठा है तब भूगोल बदल बैठा है। जैसा के 1971 में हुआ। इसकी शालीनता और अहिंसा को इसकी दुर्बलता समझने वालों ने हमेशा मूँह की खाई है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सबकुछ स्वर्णिम ही रहा है। इसके यश धन ओर संसाधनों के लालच में कई आक्रामकता भी इसको सहनी पड़ी। परिणाम स्वरूप सोमनाथ मंदिर का विध्वंस, जबरन धर्म परिवर्तन हिंसा आदि सब कुछ इसके खाते में गया और जैसे कि इतना कम था, अंग्रेजों ने भी सोने की चिड़िया पे हमला कर के इसे अपने राज’का हिस्सा बना लिया।
हज़ारों साल की गुलामी का परिणाम यह हुआ है कि भले ही आज हम स्वतंत्र हो परन्तु हमारे अंदर, अभी भी ‘दासता’की मानसिकता गई नहीं है। अपने संस्कार, संस्कृति, सभ्यता, धर्म को हीन देखना हमारी आदत में डाला गया हैं पर मैं आशावादी हूँ और इस मानसिकता को धुटने टेकते हुए देख रहा हूँ जब प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण दें, जब Snake Charmer कहे जाने वाले देश का ISRO एक साथ 104 सैटेलाईट, अंतरिक्ष में भेजे, जिसमें 100 से अधिक अन्य देशों की थी, तब यह लगता है कि मेरा देश बदल रहा है ओर स्वामी विवेकानंद, गांधी, तिलक, सावरकर, कलाम आदि महापुरूषों के आर्दशों की ओर अग्रसर हो रहा है।
चार हजार साल है, आयू मेरी
लेकिन फिर भी मैं जवान हूँ
हूँ मैं हिमालय, गंगा, यमुना सिंधु में
और हर नागरिक में भी विद्मान हूँ
हुए हैं मेरी छाती में हमले हजार
फिर भी मैं आगे बढ़ता जाता हूँ
हर अंधेरे बाद आता है नया सवेरा
इसलिए अटल गीत नया गाता हूँ
मेरी कहानी खतम नहीं होती है
क्योंकि मेरी किस्मत कभी नहीं सोती है।
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