वो गरदई इलाका वो झुलसे हुए लोग
बदहाल हालत माथे से टपकते पसीने की लय,
दया जो मैं देख रही हूँ सत्य है या भ्रम
मारो, काटो प्रताड़ित करो और ला दो खौफ़ का प्रलय,
कहीं मजार, रगदा से टिपटा शरीर, भीतर को घुसी आँखें
ललाट पे लज्जा, खौफ़ और गुलामी की लकीरें,
पत्थरों को तोड़ो, हारामजादें, जल्दी—जल्दी हाथ चलाओ
ऐसी हालत की आह् निकल जाए, बस हुक्म की तामीरे
भारत का हर एक भूखा गरीब और मौत से हारा व्यक्ति
शामिल था उस प्रताडना की रेल में,
औरतें बच्चे, बड़े, बूढे़, सब थे बस न थी तो आजादी, खुशी और मुस्कान
आतुर थे मानो काल के गाल में समा जाने को क्योंकि अब जी उब गया
था इस प्रताड़ना की जेल में,
दिन भर की वो जिंदगी में कशमकश और रात को
वो बासी रोटी और कूलड़ का पानी मानो
मजबूर कर देता फिर कल सुबह जगने के लिए,
इमारत को बनने में वक्त तो था और कई बरसाते भी
और उम्मीद थी गुलामी के कीचड़ में फिसल कर फिर चलने के लिए
कहीं वो रोती बिलखती नन्हीं सी जान कहीं अपने कुम्लाएं हुए चेहरे
से प्यासी नज़रों देखता वो बालक कोई तो आज बात थी
पीपल के पेड़ पे दीपक जलाए आस बांधे नजरे झुकाऐं
आस लगाए बस आज़ादी की प्यास थी।
इमारत धीरे—धीरे आसमान से बराबरी करने की होड़ करने लगी
आशा किरण थी, अगर ये बन गई तो कुछ दिन
ही सही किलकारिया और मुस्काने देहरी में खेलेगी
तभी ए सरता हुआ पत्थर खिसा चीखे निकली
लोगों की आशाऐं फिर डगमगाने लगीं।
बदहाल ज़िदंगी गुलामी के साये में फिर हार गई
भीड़ जमा हुई क्रूर शासक का गुलाम अनदेखा
करे काम पर चलने को कहा
और यह इमारत फिर एक पाक जान खा गई।
लोग रातें भडभड़ाते, बिलखते, सिसकते से नज़र आए
हर तरफ एक डर का साया सा दिखा
वो इमारत अब मुझे अपने चरम पर सीने ताने गुंबद को संभालें
और लोग मुझे अब इमारत को उम्मीदी नज़रों से निहारते से नज़र आए।
लेकिन ये क्या इमारत हिली चीख निकली नींद टूटी और ख्याल मेरे स्तब्ध रह गए,
और भीतर का भय पसीने की शक्ल ले माथे पर आ उमड़ा।
सोचा माँ का आंचल पकड़ फिर सो जाऊ हाथ जो
आंचल की उम्मीद में निकले चादर की सिलवट को मुठ्ठी में जकडे रह गए
तो ऐसे बनी थी, गुलाम भारत की कलकत्ता की एक और गुलाम इमारत
यह थी उस गुलामी के ग्रंथी की एक छोटी सी कहानी
प्रताड़ना की कहानी! गुलामी की कहानी! और भारत की कहानी!
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