Batch No. 339
भारत एक कहानी
भाषा- हिन्दी समयः 12:30 (रचनात्मक लेखन)
शीर्षक नायक और नायिका: एक विरह ऐसी भी
प्रस्तुत लेखन एक विशाल पेड़ और स्ट्रीट लाइट की एक अधूरी प्रेमकहानी है। जहाँ पर पेड़ का सम्बन्ध नायक से तथा स्ट्रीट लाइट का सम्बन्ध नायिका से है।
वो स्ट्रीट लाइट के मर्करी की तरह उजली थी, और मैं स्ट्रीट लाइट के काले खम्भे जैसा। उसके प्रकाश की दमक, मोह, आकर्षण मुझे बेहद आकर्षित करता था। मैं उसके बेहद करीब रहता था, परन्तु उसके रूह तक जाने का अहसास अपने आप में कैसा होगा, इसकी बेचैनी मुझे खाये जाया करती थी। पूरे दिन हम दोनों इस दुनिया की आपाधापी में खोये रहते थे। लेकिन शाम/रात का इन्तजार मुझे भी होता था और शायद उसे भी।
जैसे-जैसे सूरज कम्बल ओढ़कर सोने की तैयारी करता , वैसे-वैसे वो घनघोर काली रात में अपनी काली जुल्फ की जटाएं लहरा कर आने की तैयारी करने लगती थी।
इस सुनसान अंधेरी रातों में हम दोनों सड़क के किनारे खड़े रहते थे। जैसे-जैसे रात बढ़ती जाती स्ट्रीट लाइट का प्रकाश तेज होने लगता था और पेड़ की शाखाओं में पड़ता था।
पेड़ अपनी कहानी बताता है......
सुनसान अंधेरी रातों में उसका प्रकाश किसी शोर के जैसा था। ये प्रकाश मुझे ताकत देता था रात अकेले खेड़े रहने की और मैं उसके साथ शायद अकेला महसूस नहीं करता था। (द्वण्द की स्थिति में)। मैं पूरी कोशिश करता था, अपनी शाखाओं को हिलाकर, अपने हरे-भरे पत्तों को झुमाकर थोड़ा नाचने की, थोड़ा झूमने की कोशिश करता था जिससे कि वह डरेगी नहीं इस सुनसान अंधेरी रात में और उसका मनोरंजन भी होता रहेगा।
आपकों पता है वेा खुश होती थी मेरे इस झूलने, नाचने, गाने (पत्तियों की सरसराहट, तड़तड़ाहट, पड़पड़ाहट) के प्रयास से तभी तो जैसे-जैसे रात बढ़ती जाती थी उसकी स्वर्ण दमक बढ़ती जाती थी और उसका पूरा प्रकाश मेरे हरे-भरे पत्तो रूपी शरीर पर पड़ता था, और धीरे-धीरे बढ़ता ही जाता था। राम में एक समय ऐसा भी आता था जब मेरा पूरा हरा-भरा शरीर उस हरिमाई के रंग से एक-गिरगिट की तरह उस प्रकाश के (स्वर्ण-पीलेपन) रंग में रंगने लगता था। हां, मुझे उसके प्रति इतनी जुनूनियत थी कि मुझे पता ही नहीं चलता था कि कब मेरी हरिमाई ने स्वर्ण-पीलेपन प्रकाश की चादर ओढ़ ली है।
मुझे यह अहसास बेहद आनन्दित करता था ऐसा लगता था कि मुझमें और उसमे कोई अन्तर ही नहीं हैं हम बिल्कुल एक जैसे हैं और दोनों की रूह बिल्कुल एक है।
(नायक, नायिका के प्रति अपने जुनून, इश्क, आकर्षक को बता रहा है। वह अपने माध्यम से नायिका को हमेशा खुश रखना चाहता है इसलिए उसे खुश रखने का पूरा प्रयास करने की कोशिश करता है। कभी-कभी तो वह यह भी भूल जाता है कि उसका प्रभाव (स्ट्रीट लाइक (नायिका) का प्रकाश) मुझ पर इतना हो गया है जिसे शायद मैं कभी कम कर ही न पाऊँ।
धीरे-धीरे रात की यह बेला कटती चली जाती, हम दोनों पूरी दुनिया से अलग अपने ख्यालों में खोये होते थे और मैं तो बिल्कुल स्थिर होता है, एक दम शान्त मन वाला हूँ उस समय यही महसूस करता था। तभी ये रात का ख्याल बदलता है, ये अपनी काली-काली जुल्फों को, जोकि बिल्कुल खुली हुई होती थी, उन्हें बांधने का सोचने लगती है और ये सूरज भी अपनी नींद पूरी करके उठने की तैयारी करता है।
जैसे-जैसे सुबह होती थी, स्ट्रीट लाइट का प्रकाश कम होने लगता था, ऐसा लगता था कि वह अपने को खो रही हो और उसके स्र्वण- पीलेपन के प्रकाश के कम होने से मेरी हरिमाई वापस आने लगती थी।
सूर्य देवता का आगमन होता है। पूरी दुनिया एक नए दिन के आगमन की खुशी मना रही होती है और एक अकेला मैं अपनी रूह को मुझे दूर जाता हुआ बस देखता रह जाता हूँ।
(समाज का भय नायक को नायिका से दूर करता है और यहाँ नायक लाचार सा महसूस करता है।)
मेरी इस विरह को, इस अजीब सी कसमसाहट, चुभन, बेचैनी को कोई समझ नहीं सकता, परन्तु मेरे प्रेम की गवाह तो मेरे पत्तों के कोरे से लटकती हुई वो आँसू की बूँदे हैं जिन्हें लोग सुबह देखते हैं और कहते हैं-
(“वो देखो ओस की बूँदों को कितनी सुन्दर हैं।”)
(नायक का नायिका से दूर जाने के कारण विलाप प्रस्तुत है।)
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