सरकते हुये वक्त और बदलते हुये माहौल का अंदाजा तो सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले पेड़-पौधों, झाडियों, बगीचों के बीच घर हुआ करते थे। हमेशा महकते फूलों की मधहोशी होती थी और चारों ओर धानी साड़ी पहने ये मौसम।
हाँ! वो भोर में सूरज की स्वर्णिम नज़रें बड़े-बड़े हरे पेड़ों की गीली जवान कोंपलों पर फिसल-फिसल जाती थी और रात में चाँद उड़ेलता था उन पर अपनी आँखों से शीतल प्याले।
लेकिन अब बहुत कुछ बदल चुका है। इस चकाचौंध भरी दुनियाँ में शीशे के चमचमाते, कंक्रीट एवं पत्थरों के घरों पर जो ऊँचे-ऊँचे पहाडों पर लगे देवदार के वृक्षों को भी चुनौतियां दिया करते हैं। उन्हीं घरों और इमारतों की मंजिलों से झांकते हुये कुछ गमलों के हाईब्रिड वाले बिना महक के फूलों को देखकर मन झट्पटा उठता है। *अब घर के अंदर ही बगीचे होते हैं।*
विशाल वन, नदियाँ हमारे रहन-सहन, रख-रखाव को पूरा करते-करते खुद अपने अस्तित्व को कब खतरे में डाल बैठे किसी को पता ही नहीं चला।गाँव जाने वाले रास्ते में बड़े-बड़े बाग मिला करते थे।
अरे! अब भी मिलते हैं लेकिन किसी परिवार की तरह उन बागों के सदस्यों की संख्या कम होती जा रही है।
मेरे घर का वो अनार और अमरूद का पेड़ काट दिया गया है। सुना है बोरिंग कराने में वह बाधा बन रहा था। कभी उसमें गौरैया, बुलबुल अपना घर बनाया करती थी और कौवा सूखी लकड़ी तोड़ कर ले जाया करता था। अब न गौरैया, न बुलबुल, न कौवा, न छाँव। बस सूरज आते ही पूरा दिन धूप बनी रहती है।
चाचा ने सागौन के पेड़ लगाये थे जो की अब सात सालों में काफी बड़े हो गये हैं। खेत के पास में वह पुराना पीपल अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है। बस वही पुरखों की एक निशानी बची है। हम हर दिवाली वहाँ घी का दीपक जलाने जाते थे। अब उसकी कोई न कोई शाखा टूट कर जब-तब गिर जाया करती है, ठीक वैसे ही जैसे बूढों के जर्जर शरीर के अंग कभी किडनी, कभी फेफडे काम करना बंद कर देते हैं। अब हम पीपल के पास बहुत कम जाते हैं। घर के पीछे लगा वो नीम का पेड़ भी तो कट गया है जिसकी टहनी पर मेरा बचपन झूला करता था। लेकिन एक बात तो है कि
जब कभी तुम परेशान होते हो तो भागते हो उन पहाड़ों की ओर, बदलते मौसमों की सैर लगाने को, उन बादलों को चूम कर उनसे भी ऊपर उठे हुये विशाल हरे-स्याह जंगलों वाले पर्वतों के पीछे, किसी सुकून की तलाश में। जो तुम्हें नहीं मिलता है इन चमचमाती इमारतों और धुएँ के बीच।
सोचती हूँ!
जब ख़त्म हो जायेंगे ये जंगल, ये पहाड़, ये बर्फ, ये झरने।
तो कैसे कल्पना को पर मिलेंगे तुम्हारे? तुम सांसो का इंतजाम तो कर लोगे ये पता है लेकिन वो कल्पना का पिटारा कहाँ से लाओगे जो तुम्हें मानसिक शांति देता है।
फ़िर कैसे कल्पना कर पाओगे अपनी प्रेमिका की गीली जुल्फों से टपकती पानी की बूँदों की तुलना किसी कोंपल से टपकती ओस की बूँद या झरने से?
क्योंकि अभी तक तो तुम उसकी हर तारीफ़ में तलाशते हो प्रकृति को। उसके गालों में गुलाब को, आँखों में कमल और मदिरा के छलकते जाम को और जिसकी कमर में तुम किसी पतली नदी की धारा को ढूँढते हो।
धीरे-धीरे समय के घड़े में छेद हो जायगा और क्षण-क्षण समय टपकता जायगा।
हाँ! ये सच है जब नहीं होगी ये प्रकृति की सुंदरता तब भविष्य में कोई 'बिहारी' नहीं ढूंढेगा किसी गिरते हुये झरने के पीछे जलते हुये दीपकों में चमचमाती, सफेद साड़ी पहने अपनी प्रेमिका को।
फ़िर कोई सूरदास ब्रज के कुंजों और जमुना के तीरों को याद नहीं करेगा।
फ़िर जाने कब कोई रत्नाकर लहराती, सकुचाती, शरमाती गँगा की धारा को शिव की जटाओं में समाहित करेगा।
फ़िर न जाने कब आकाश में उमड़ते, गरजते और बरसते बादलों को देखकर कोई 'निराला' अपने हृदय के उल्लास को वाणी देगा और किसी संध्यारूपी सुंदरी के आकाश से उतरकर सम्पूर्ण धरा पर छा जाने का एक सशक्त बिम्ब प्रस्तुत करेगा।
न जाने कब कोई 'पन्त' गँगा नदी में किसी तरुणी को, उसकी भँवरों में कपड़ों की सिलवटों और आकाश के तारों में पल्लू को तलाशेगा।
फ़िर शायद लोग इतिहास से बेखबर हो जायेंगे। जब कट जायेंगे ये जंगल तब पौधे लगाना तो दूर उन्हें फुरसत ही नहीं होगी किसी पुराने बरगद को तलाशने की और उसकी छाँव में लेटकर कल्पना की नींद में ख्वाब देखने की और अपने अतीत की गहराइयों में गोता लगाने की।
--श्रेया उत्तम
-हिंदी पत्रकारिता एवम जनसंचार।
-रामलाल आनँद महाविद्यालय।

Comments
Post a Comment